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अध्यक्षीय उद्बोधन (डा. मुरली मनाहर जोशी जी) विश्‍व हिन्‍दी दिवस 10 जनवरी 2017 के अवसर पर

अध्यक्षीय उद्बोधन (डा. मुरली मनाहर जोशी जी)  विश्‍व हिन्‍दी दिवस 10 जनवरी 2017 के अवसर पर

विश्‍व हिन्दी परिषद द्वारा आयोजित हिन्दी दिवस के सुअवसर पर अपने अध्यक्षीय भाषण में पूर्व केन्द्रीय मंत्री व सांसद माननीय डा. मुरली मनोहर जोशी ने कहा कि मातृभाषा हिन्दी का संविधान में जो स्थान मिलना चाहिए अभी तक नहीं मिल पाया है। अपने वक्तब्य में माननीय डा. जोशी ने कहा कि देश की तीन चैथाई लोगों की भाषा हिन्दी है। पूर्वोत्तर भारत की भी संपर्क भाषा हिन्दी है। देश की आम जनता, शिक्षाविदों, समाज के सभी वर्गों, राजनेताओं और अधिकारियों को हिन्दी को सशक्त और संबर्दि्धत करने के लिए संविधान के अधिनियमों में संबोधन के लिए एकजुट होकर आगे आना होगा, तभी अंगे्रजी भाषा का प्रयोग बंद हो सकेगा। इसके लिए दृढ़ ईच्छाशक्ति की जरूरत है। इस अक्सर पर उन्होंने कहा कि जापान, रूस, चीन, इजराइल, जर्मनी के शोधपत्र अपनी भाषा में ही प्रकाशित होती है, तो हमारे देश में शोधपत्र हिन्दी में क्यों नही प्रकाशित हो सकती। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि बतौर भौतिक विज्ञान के प्राध्यापक होने के नाते, मैं हमेशा हिन्दी भाषा में ही ब्याख्यान देता था और हमारे द्वारा पढ़ाऐ गए विद्यार्थी प्रधानमंत्री, कैबिनेट सचिव और कई सचिव बन चुके हं। उन्होंने कहा कि सर व मैडम कहलाना लोगों को विशेष रूप से पसंद है लेकिन भाई व बहन जी का संबोधन में उन्हें रूचि नही होती।उन्होंने कहा कि बच्चों को कान्वेंट में अंग्रेजी की कविता-‘ट्विंकल ट्विकल लिटिल स्टार’तो सिखा दिया जाता है,लेकिन हमारे बच्चों को रामचरित मानस के दोहे से वंचित रखा जाता है।उन्होने कहा कि मातृभाषा हिन्दी का सम्मान करना चाहते है तो इसकी शुरूआत घर से कीजिए।