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कार्यक्रम

13 - 14 सितंबर को विश्व हिंदी परिषद द्वारा दिल्ली स्थित एनडीएमसी सभागार में होने वाले 'अंतरराष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन' का छायाचित्र

13 - 14 सितंबर को विश्व हिंदी परिषद द्वारा दिल्ली स्थित एनडीएमसी सभागार में होने वाले 'अंतरराष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन' का छायाचित्र

 

 डाउनलोड करने का लिंक नीचे है।

 

https://drive.google.com/drive/folders/13iGCDKl5OAVOpf2UQqD9N14a1Jgg5ntH?usp=sharing

 

दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन

गाँधी एक ऐसा व्यक्तित्व है जिसे समझने के लिए वैचारिकी का मजबूत होना ठीक उसी तरह आवश्यक है जैसे विज्ञान को समझने के लिए तर्क, समाज को समझने के लिए साहचर्य और संवेदना, साहित्य को समझने के लिए सृजन, राजनीति को समझने के लिए राग व विवेक, संस्कृति को समझने के लिए सद्भावना और संबंधों को समझने के लिए भावनाओं इत्यादि का होना अनिवार्य है। गाँधी के व्यक्तित्व का आयाम इतना विशाल और विहंगम है कि इसे जितने कोणों से देखें उतने ही दृष्टिकोणों का निर्माण होता है। विश्व हिंदी परिषद द्वारा राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी की 150वीं जयंती के शुभ अवसर पर आयोजित इस सम्मेलन का उद्देश्य आज के समय में वाद, संवाद और सन्देश के विमर्श में बहुआयामी गाँधी के व्यक्तित्व और कृतित्व को वैश्विक परिदृश्य में अवलोकित करने का विनम्र प्रयास है।

विश्‍व हिन्‍दी दिवस-2019

विश्‍व हिन्‍दी दिवस-2019

डा. बिपिन कुमार, महासचिव, विश्व हिन्दी परिषद का उद्बोधन

विश्व हिन्दी परिषद के महासचिव डा. बिपिन कुमार ने सभागार में उपस्थित अतिथियों को संबोधित करते हुए कहा कि आज का दिन हम राष्ट्रीय पर्व के रूप में विश्व हिन्दी दिवस समारोह मनाते आ रहे हैं। गणमान्य आगंतुकों एवं हजारों हिन्दी-प्रेमियों के बीच एक महत्वपूर्ण जानकारी साझा करते हुए उन्होंने कहा- ‘हिन्दी’ आज दुनिया में सबसे ज्यादा बोले जानी वाली भाषा बन गई है। वर्तमान में औसतन एक अरब तीस करोड़ लोग हिन्दी बोलते, लिखते व समझते हैं।

प्रो. कप्तान सिंह सोलंकी, महामहिम राज्यपाल, हरियाणा के अध्यक्षीय भाषण

विश्व हिन्दी परिषद द्वारा आयोजित विश्व हिन्दी दिवस एवं कवि सम्मेलन समारोह में हरियाणा के राज्यपाल, महामहिम प्रो. कप्तान सिंह सोलंकी ने कहा कि राष्ट्रध्वज, राष्ट्रगान और राष्ट्रभाषा से किसी देश की विशिष्ट पहचान होती है। हमारे देश का राष्ट्रध्वज और राष्ट्रगान तो है लेकिन राष्ट्रभाषा नहीं है जिसके बिना हमारी स्वतंत्रता अधूरी है।

मुख्य वक्ता के रूप में श्री तरूण विजय, सांसद-राज्यसभा के उद्गार

श्री तरूण विजय जी ने अपने उद्बोधन की शुरूआत सभागार में उपस्थित हिन्दी प्रेमियों का अभिनंदन करके किया। उन्होंने कहा कि मैं विश्व हिन्दी परिषद के महासचिव डा. बिपिन कुमार जी का विशेष आभार प्रकट करता हूं। कैलाश मानसरोवर की आध्यात्मिक यात्रा का एक वृतांत सुनाते हुए कहा कि जब मैं तिब्बत से गुजर रहा था, तब किसी अंजान व्यक्ति ने मुझे भाई साहब कह कर पुकारा, मैं आश्चर्यचकित रह गया कि तिब्बत में हिन्दी बोलने वाला कहाँ से आ गया?

मुख्य अतिथि के रूप में डा. अरूण कुमार, सांसद-जहानाबाद के अभिभाषण

अपने संबोधन में डा. अरूण कुमार जी ने कहा कि ‘हिन्दी’ पवित्र गंगा के समान है, यह तमिल, तेलगू, कन्नड़, मलयालम, उड़िया, भोजपुरी, अवधी, ब्रज, मैथिली इत्यादि सबको अपने आँचल में समेटती व समाहित करती है। ‘हिन्दी’ संयुक्त राष्ट्र संघ की आधिकारिक भाषा का दर्जा शीघ्र प्राप्त करेगी, ऐसा मुझे भी विश्वास है, किन्तु पहले यह हमारे दिल की भाषा बने, अंतःकरण की भाषा बने, ऐसी मेरी कामना है।

मुख्य अतिथि के रूप में श्रीमति मीनाक्षी लेखी के उद्गार

‘हिन्दी के वैश्विक प्रचलन को बढ़ाने में पूर्व प्रधानमंत्री माननीय अटल बिहारी वाजपेयी जी, माननीय नरसिम्हा राव जी, विदेश मंत्री माननीया श्रीमति सुषमा स्वराज जी एवं वर्तमान प्रधानमंत्री माननीय श्री नरेन्द्र मोदी जी का अग्रणी स्थान रहा है। श्रीमति लेखी जी ने उपस्थित जनसमूह को संबोधित करते हुए कहा कि ‘हिन्दी’ को अपनी माँ के समान समझें। उससे प्रेम करना चाहिए एवं उसकी सेवा करनी चाहिए तभी हम वास्तव में इसे राजभाषा से राष्ट्रभाषा के रूप में सुशोभित कर सकेंगे।

मुख्य अतिथि के रूप में श्री प्रभास कुमार झा, सचिव, राजभाषा विभाग के वक्तव्य

विश्व हिन्दी परिषद के महासचिव डा. बिपिन कुमार की हिन्दी के लिए की जा रही सतत संघर्षपूर्ण भूमिका अत्यंत सराहनीय है। हिन्दी के प्रति उनकी दृढ़ता, अवचेतनता, अविस्मरणीय दृष्टिगोचर होती है। इस पुनीत कार्य में, इस राष्ट्रीय यज्ञ में मैं अपनी नैतिक आहुति देने को तत्पर हूं और सदैव रहूँगा। इस कार्यक्रम में हिन्दी प्रेमियों की विशाल उपस्थिति बेहद प्रशंसनीय है।

विशिष्ट अतिथि के रूप में श्री के.एम. सिंह, अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक, एन.एच.पी.सी. के वक्तव्य

विशिष्ट अतिथि के रूप में श्री के.एम. सिंह जी ने कहा कि हम हिन्दीभाषी हैं और आज यहाँ उपस्थित सभी दर्शकगण भी हिन्दी प्रेमी हैं। हिन्दी के प्रति आपकी आस्था को करबद्ध प्रणाम करता हूँ साथ ही साथ शुभकामनाएँ भी देता हँू। भाषाई खाई को पाट कर ‘हिन्दी’ को सर्वोच्च स्थान मिले, ऐसी मेरी आकांक्षा है और इसमें जब भी मेरी जरूरत पड़ेगी, मैं तत्पर रहूँगा।

‘‘मातृभाषा ‘हिन्दी’ हृदय की भाषा है।’’

मातृभाषा की विशेषताओं का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि जब कार्यालय मंे हम सहकर्मी बंधु आपस में बातचीत करते हैं तो प्रायः अंग्रेजी में ही बातें करते हैं, लेकिन उस वार्तालाप में वो आत्मीयता नहीं झलकती जो अपनी मातृभाषा में बात करने में आनंद मिलता है।

‘‘भारत के सभी भाषाओं की लिपि ‘देवनागरी’ और राष्ट्रभाषा ‘हिन्दी’ हो।’’

मातृभाषा ‘हिन्दी’ को न सिर्फ उत्तर भारतीयों ने अपितु दक्षिण, पूर्व और पश्चिम के अधिसंख्य लोगों ने अंगीकार किया है। हिन्दी भारत के जन-जन की भाषा है, हमारे अंतःकरण की भाषा है। एक प्रशासक के रूप में मैंने अपने संपूर्ण सेवाकाल में हिन्दी के संवर्धन हेतु यथासंभव कार्य संपादित किया और अन्य सहकर्मियों को भी प्रेरित किया जिससे मुझे आज भी अत्यंत गर्व की अनुभूति होती है।

‘‘हिन्दी’ हिन्दुस्तान का पवित्र संकल्प है।’’

राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की इन पंक्तियों को कोट करते हुए विशिष्ट अतिथि के रूप में उन्होंने अपने उद्बोधन की शुरूआत कीः-
‘‘गवाक्ष तब भी था, जब वह खोला न गया,
सच तब भी था, जब वह बोला न गया।’’

‘‘आज ‘हिंदी’ विश्व की दूसरी सबसे बड़ी भाषा है।’’

हिंदी का विरोध करने वाले व्यक्तियों, संस्थानों एवं राजनैतिक दलों को ’राष्ट्रविरोधी हरकत का दोषी’ कहने में मुझे तनिक भी संशय नहीं। अंग्रेज चले गए पर अंग्रेजियत छोड़ गए। सच कहूं तो मुझे बहुत तरस आती है ऐसे अंग्रेजीदां लोगों पर, इन्हें शुद्ध-शुद्ध अंग्रेजी बोलना-लिखना नहीं आता फिर भी अंग्रेजियत का बोझ ढ़ोते रहते हैं कथित रूप से संभ्रांत दिखने के लिए।

‘‘हिन्दी भाषा एक महान भाषा है, यह पूरे हिन्दुस्तान की भाषा है।’’

मातृभाषा प्रेमियों के लिए यह दुर्भाग्य की बात है कि अपने राष्ट्र की भाषा  को प्रतिस्थापित करने हेतु ‘हिन्दी-दिवस’ जैसे कार्यक्रम आयोजित करने की जरूरत पड़ती है और सौभाग्य की बात यह है कि आजादी के बाद तत्कालीन सरकार के अधिकांशतः नेता गैर हिन्दी प्रदेशों से थे जिन्होंने राष्ट्रभाषा के रूप में ‘हिन्दी’ की पुरजोर वकालत की, अंततः राजभाषा के रूप में हिन्दी को संवैधानिक रूप से अंगीकृत किया गया।

‘‘हिन्दी, राष्ट्रीय अस्मिता का प्रश्न है...’’

प्रश्न केवल भाषा का नहीं है, प्रश्न हमारे स्वाभिमान का है, राष्ट्रीय अस्मिता का है। शिकागो में पहली बार राष्ट्रीय स्वाभिमान जगाने का काम स्वामी विवेकानंद जी ने किया था। इस संदर्भ में राजगोपालाचारी जी ने कहा था- यदि स्वामी जी नहीं आये होते तो स्वतंत्रता आंदोलन की तैयारी में कुछ और विलंब हो जाता।

‘‘मातृभाषा ‘हिन्दी’ के बिना हिन्दुस्तान अधूरा है...’’

राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की पंक्तियों से अनुप्राणित होते हुए उन्हांेने कहाः-

‘‘वह प्रदीप जो दीख रहा है, झिलमिल दूर नहीं है,

थक कर बैठ गए क्यूं भाई, मंजिल दूर नहीं है।’’

मातृभाषा प्रेमियों से पूर्णतः भरे सभागार को देखकर अत्यंत हर्षित होते हुए महासचिव महोदय ने कहा कि आज हम सभी हिन्दी-प्रेमी केवल ‘हिन्दी दिवस’ मनाने नहीं बल्कि मातृभाषा हिन्दी के सम्मान में ‘राष्ट्रीय उत्सव’ मनाने को एकट्ठा हुए है।

जिस तरह राष्ट्रभाषा के बिना कोई राष्ट्र पंगु हो जाता है, उसी तरह हिन्दी के बिना हिन्दुस्तान अधूरा प्रतीत होता है।